panghat-पनघट

September 24, 2008

half — हम सब आधे रास्तों की जिंदगी जी रहे हैं

Filed under: काव्य

हम सब आधे रास्तों की जिंदगी जी रहे हैं हम सम्पूर्ण आवेगों के साथ
न तो घृणा कर पाते हैं न प्यार
न तो क्रोध कर पाते है, न क्षमा अधूरी कामनाऎं, अधूरी ईच्छाऎं,
अधूरे सपने, अधूरी बातें सब कुछ अपने में छिपाऎ अधूरे रास्तों पर घूमते हैं
हम जीवन को सम्पूर्ण जीने से डरते है, कतराते है अधूरी द्रष्टि, अधूरे विचार, अधूरे सम्बन्धों को
अपनाते हैं और उन्हें जो पूर्णता की खोज में
लावारिस घूमते मिल जाते हैं
आधे रास्ते से लौटा देते है. –कवि सर्वेश्वर दयाल.






















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