panghat-पनघट

March 15, 2007

forever शाश्वती

Filed under: काव्य

* हम ‘महान साहित्य’ और ‘महान लेखक’ की चर्चा तो बहुत करते है । पर क्या ‘महान पाठक’ भी होता है ? या क्यों नही होता, या होना चाहिए ?

क्या जो समाज लेखक से ‘महान साहित्य’ की माँग करता है, उस से लेखक भी पलट कर यह नहीं पूछ सकता कि ‘क्या तुम महान समाज हो ?’

अगर ‘देश को वैसी ही सरकार मिलती है जिस के वह योग्य है,’ तो क्या ‘समाज को भी वैसा ही साहित्य मिलता है जिस के वह योग्य है’ ?

* आप को पहले से मालूम है कि आप क्या खोजने चले है, और आप अपने को रीएलिस्ट कहते है !

* खोजने चलो आदमी

मिलती है जनता ।

छपती है खबरे

ईतिहास नहीं बनता ।

* पेड के नीचे रुक कर सुस्ता लिया, फिर कापी निकाली तो मैं एक लम्बी साँस सुन कर चौंका । पर आस-पास कोई नहीं था । मैं ने सोचा, भ्रम होगा, हवा होगी । फिर लिखने की और दतचित हुआ ।

लम्बी साँस फिर सुनाई दी ।

पेड ने लम्बी साँस ली थी ।

मै ने कहा, “क्यों, पेड ,क्या हुआ ?’

पेड ने कहा, ‘तुम कवि हो न ?’

मै ने कहा, ‘हूँ भी तो क्या ? वन-प्रकृति का भक्त हूं, पेडो से प्रेम है मुझे–’

पेड टोक कर बोला, ‘होगा,होगा । तुम पेड पर कविता लिखो, या पेड को बचाने के आन्दोलन के लिए ही कविता लिखो, छपेगी तो पेड की लुगदी पर ही । जब-जब कोई लिखता है मैं लम्बी साँस लेता हूँ : यह पेड काटने का एक और निमित बना…’

पेड ने फिर लम्बी साँस ली ।

पेड के साथ कविता का एक यह भी रिश्ता है । ईतना साफ नहीं दिखा था न ?

कम लिखो । जब तक अनिवार्य न हो मत लिखो । जितना बनाना-सँवारना है, मानस में ही कर के तब रुप को कागज पर उतारो—जितना घना, छोटा, गठीला बना कर सम्भव हो…..

और हमेंशा पहले पेड को प्रणाम कर के, क्यों कि वही तुम्हारी बलि है…..

—”अज्ञय” [ शाश्वती]

More information : Agyeya

Comments »

The URI to TrackBack this entry is: http://ashok.blogsome.com/2007/03/15/p19/trackback/

No comments yet.

RSS feed for comments on this post.

Leave a comment

Line and paragraph breaks automatic, e-mail address never displayed, HTML allowed: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <code> <em> <i> <strike> <strong>























Get free blog up and running in minutes with Blogsome | Theme designs available here