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December 29, 2006

how i can walk with you - कैसे चल दूँ

Filed under: काव्य

आज आपके सामने कवि दिनेश सलसेना दिनेशायन की रचना “कैसे चल दूं ” प्रस्तुत कर रहा हुं.

कैसे चल दूं

देश अजाना, पंथ अजाना
नाम न जाना, धाम न जाना
तुम्हीं बताओ, कैसे चल दूं, बैठ तुम्हारी पालकी
भरी बहारों पवन न डोला
चाँद सितारों ने विष धोला
कभी न लट गूँथी बदली ने
लाज लुटाई गली-गली ने
माँग न सेन्दुर, आँख न अंजन
पग न महावर, हाथ न कंगन
कैसे बैरिन बिंदिया से, शोभा दमकाउँ भाल की
सेज कली की सदा कटीली
भरी जवानी पीली-पीली
स्वप्नीली तस्वीर मिटाकार
कभी सेज पर कभी चिता पर
हँसी न मधुऋतु, उडी न केसर
लसे न भँवरो के नीलम पर
कैसे कलियाँ बन महकूँ तेरी चंपक उरमाल की
उड उड छाने अम्बर-भूतल
गिरते रहे पंख तिल-तिल जल
शाख-शाख ने ताने मारे
रुठे तिनके-दान सारे
नीड न चहके सांझ सवेरे
घनी रात लुट गये बसेरे
कैसे काटूँ रैन, बिरानी सेज अजानी डाल की
जब जब मंगल वेला आई
बजी नौबतें शुभ शहनाई
सिसक पडी सिंगार पिटारी
सपने दर दर बने भिखारी
दमक न पाई चुनरी-चोली
बाट जोहती सूनी डोली
किससे जोडूँ गांठ उमर बन चली दुल्हनियाँ काल की
–कवि दिनेश सकसेना दिनेशायन






















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