platonic love - बन न सकूं पाषाण
आज कवि भवानी प्रसाद तिवारी की रचना “बन न सकूं पाषाण” आपके सामने प्रस्तुत कर रहाँ हुं.
बन न सकूं पाषाण
कैसे छोडूं यह जीर्ण जगत, रह गये अधूरे गान, सखी
पग-ध्वनि सुनती हूं, आएँगे मन के रथ पर महेमान, सखी
जन-स्तुति के स्वर्णिम मंदिर में
वे प्रतिमा प्रस्तर, देव बने
लाचार, मनुजता खो न सकी
है मुझमें उनमें भेद घने
वे मनुज बनें तो बनें भले, मै बन न सकूं पाषाण, सखी
पग-ध्वनि सुनती हूं आएँगे, मन के रथ पर मेहमान, सखी
मैने कब माना, बहुत कहा
जगने, प्रिय आते सपने में
मै जगती हूँ, मैं तो देखूंगी
जाग्रत को ही अपने में
आखें मूंदें यदि परस करें मेरे जी को, वे प्राण, सखी
पग ध्वनि सुनती हूं, आएँगे मन के रथ पर मेहमान, सखी.
-कवि भवानी प्रसाद तिवारी
