panghat-पनघट

March 20, 2006

cry - रुदन

Filed under: काव्य

यह कौन सी व्यवस्था है ?

यह कौन सी व्यवस्था है
नाटक के सारे पात्र जहां
खलनायक है
खुशामदी विदुषक
जिनके हर कूकर्म पर
तालिया बजाते है
जहां तिकडमी लफंगे
सत्ताधारी है
हाकिम तोडते है नियम
कानून-कायदे सिर्फ मामुली
लोगो के
वास्ते है
शरिफ धक्के खाते है
जहां सच्चाई दंडनीय है
सही बात कहने का साहस
संगीन अपराध है
-गिरजाकुमार माथुर

March 12, 2006

agun night - फागुन की राते है

Filed under: काव्य

फागुन की राते चल रही है और ईसी बारे मे कवि मोहन अम्बर अपने काव्य कहते है अनविवाहीत का क्या हाल होता है.

फागुन की रातें है

चन्दा की शादी है,चादी की रातें है
तुमसे-कुछ कहने को,अधरो पर बातें है
पागुन की राते है
झिलमिल से तारे तो आतिश-अनारों-से
उजली पोशाकों में, बादल कहारो-से
नभवाली डोली में, दुल्हे-से चाँद को
लेकर जो जाते है, धरती को भाते है
फागुन की रातें है
नदियाँ पातुरनी-सी पायल बजाती है
समधिन-सी गेहूँ की बाले लजाती है
दर्शक - समूहो-सें पेडों के कुनवे है
कोलाहल करने को हिलडुल कर गाते है
पागुन की रातें है
गंधी की लडकी-सी बेला चमेली है
खुशबू-सा यौवन ले फिरती अकेली है
बाराती-लडकों से गेंदे के फूलों पर
कनखी ही कनखी में कर जाती घातें है
पागुन की रातें है .
खेतों के लावें मशालो से जलते है
शिशिरा के झोंके तरुणियों से चलते है
पीपल के पातों को ताशे-सा बजता सुन
अनगिन अनब्याहे-से मन दुख-दुख जाते है
पागुन की रातें है.
—कवि मोहन अम्बर

March 5, 2006

what i give u- तुम भी

Filed under: काव्य

आज-कल फागुन का महिना भी चल रहा है चलो आज कवि नरेन्द्र शर्मा की कविता को याद कर ले.

तुम भी बोलो, क्या दूँ रानी

पगली ईन क्षीण बाहुओं में
कैसे यों कस कर रख लोगी

एक, एक एक क्षण को केवल थे मिले प्रणय के चपल श्वास
भोली हो, समझ लिया तुमने सब दिन को अब गुंथ गये पाश
स्वच्छंद सदा मै मारुत-सा

वश में तुम कैसे कर लोगी
लतिकाओं के नित तोड पाश उठते ईस उपवन के रसाल
ठुकरा चरणाश्रित लहरों को उड जाते मानस के मराल
फिर कहो, तुम्हारी मिलन रात
ही कैसे सब दिन की होगी
मै तो चिर-पथिक प्रवासी हू, था ईतना ही निवास मेरा
रोकर मत रोको राह, विवश यह पारद-पद जीवन मेरा
राका तो एक चरण रानी
पूनों थी, मावश भी होगी

जीवन भर कभी न भूलूँगा उपहार तुम्हारे वे मधुमय
वह प्रथम मिलन का प्रिय चुम्बन यह अश्रु-हार अब विदा समय
तुम भी बोलो, क्या दुँ रानी
सुधि लोगी, या सपने लोगी

-कवि नरेन्द्र शर्मा






















Get free blog up and running in minutes with Blogsome | Theme designs available here