panghat-पनघट

January 29, 2006

only for you-तुम्हें ही अपनाया है

Filed under: काव्य

तुम्हें ही अपनाया है
*************** तुम्हीं न समझीं जब मेरे गीतो की भाषा
दुनिया सौ-सौ अर्थ लगाये, कया होता है.
यह मेरे मन की कमजोरी या मजबूरी
कुछ भी कह लो, सिर्फ तुम्हे ही अपनाया है.
तुम्हें समर्पित किया सहज ही ईस जीवन में.
जो कुछ भी खोया-पाया, रोया-गाया है.
तुम्हीं न दुहरा पाई मेरे गीत प्राण ! जब
सारा-का-सारा जग गाए, कया होता है. मात्र बहाना था गीतो का सुजन मुझे तो
अपना दर्द तुम्हारे दिल तक पहुँचाना था
जो न अन्यथा कह पाता मै- सुन पाती तुम
कुछ ऐसा था राज तुम्हें जो समझाना था
मेरा दर्द न छू पाया जब हदय तुम्हारा
पत्थर का भी दिल पिधलाए, क्या होता है. और सभी मिल जाते केवल वही न मिलता चाह करो जिसकी, दुनिया का यही नियम है. सारे स्वर सध जाते केवल वही वही न न सधता जो प्रिय हो मन को, जीवन ऐसी सरगम है.
तुमहीं न अर्पण मेरा जब स्वीकार कर सकी
यह सारी दुनिया अपनाए, क्या होता है.
=कवि बालस्वरुप राही

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