panghat-पनघट

November 27, 2005

desire in heart - ईच्छा मन में है

Filed under: काव्य

बहुत सी मन मे ईच्छाए होती है परंतु भाग्य मे नही मिलता परंतु प्रयत्न करने से कभी कभी सफलता मिल भी जाती है. आज कवि भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य आपके संन्मुख प्रस्तुत करता हुं

ईच्छा मन में है
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तुम्हें काम है, किंतु एक क्षण
पास बैठ जाने की ईच्छा मन में है
बहुत पास हुँ , किंतु एक क्षण
और पास आने की ईच्छा मन में है.

बहुत दिनों से पास बैठकर
चुपके ईकटक,देखा नहीं तुम्हारा मुखडा
बहुत दिनों से पास बैठकर
मैने तुमसे कहा नहीं है जी का दुखडा

बहुत दिनों के बाद आज फिर
वैसा सुख पाने की ईच्छ मन में है.

आज परम आषाढ बरसता
हैं आच्छादित दशों दिशायें
जाने कब से घिरी नहीं थी
ऐसी निविड अँधेरी
रिमझिम - भरी निशायें

आज मेघ की तरह दु:ख का
राग तनिक गाने की ईच्छा मन में है.
=कवि भवानी प्रसाद मिश्र

November 20, 2005

u r my queen रानी तुम्हे बना दुँ

Filed under: काव्य

हर व्यकित अपनी प्रियतमा को रानी ही मानता है और ये चाहता के सारे जगत मे बस मेरी प्रियतमा ही सबसे सुंदर है. “भवानी प्रसाद मिश्र” का काव्य “रानी तुम्हे बना दुँ ” मे यही बात की गई है :
रानी तुम्हे बना दुँ

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रुको,फुल दो-चार और वेणी में तनिक लगा दुं
रुको, एक यह माला मनकी ग्रीवा में पहना दुं
ईस अमराई की साम्रागई
ईस वसंत-भर तुम हो

अलिदल, कोकिल,मुकुल
मंजरी तुम्हीं,पंचशर तुम हो

चुम्बन-तिलक भाल पर देकर रानी तुम्हें बना दुं
रुको, एक यह माला मनकी ग्रीवा में पहना दुं
रुको, चरण में चित डाल दुं
गलियाँ गीतो से उजाल दुं
रुककर हँसो, वासनाओं को गंगा में नहला दुं
रुको, एक यह माला मन की ग्रीवा में पहना दुं
=कवि भवानी प्रसाद मिश्र






















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