panghat-पनघट

September 25, 2005

no meeting her-मुलाकात होती नहीं

Filed under: काव्य

कोई व्यकित को अगर आप बहुत प्रेम करते हे परंतु आप मिल नही सकते ईसे बडा दु:ख क्या हो सकता हे और अगर सामने आ भी जाये तो अपनी मन की बाते कह नही सकते और अपनी व्यथा को युही मन मे अकेले आंसु बहाते रहेते.
जब उनसे मुलाकात होती है तो आगे बढ नही सकते और “पहेले तुम पहेले तुम” ऐसी परिस्थित उत्पन्न हो जाती है कवि वीर कुमार अधीर का काव्य यही बात कहेते हे.
मुलाकात होती नहीं
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प्यार शतरंज का एक वह खेल है
शह-हजारो, मगर मात होती नहीं
भावना के सुधर मोहरों की लिये
बिछ रहा है दुगों का पटल सामने
यह खिलाडी हदय चाल चलता रहा
भाव उलझा खडा है अटल सामने
दिल बहल जाय बस,और तकरार कया
काटनी है उमर, जीत क्या , हार कया
खेलते हों जहां दो खिलाडी हदय
उस जगह पर कभी रात होती नहीं
पास दीवार के पार बैठे हुए
प्यार की पंकितयां गुनगुनाने लगे
बन गया यह तुम्हारा बहाना सरल
गीत में बात मन की सुनाने लगे
जोडकर आज एकांत की महफिलें
उम्र की राह पर तुम मिले, हम मिले
नैन से नैन की बात होती रही
प्यार से प्यार की बात होती नहीं
रेशमी शाम की चूनरी उड चली
रुप की रोशनी से समाँ भर गया
गाल छूता हुआ-सा हवा की तरह
एक आँचल गुजर कर हवा कर गया
भीड की आट से ताकते झाँकते
दो नयन मुफत बदनाम कर खो गये
रास्ते मिल गये ,दुग मिले , मन मिला
किंतु फिर भी मुलाकात होती नही
=कवि वीर कुमार अधीर

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