evening time’s-शाम होते ही
संध्या हंमेशा गमगीन होती है ये किसी लेखक ने कहा था ओर ये बात सत्य है क्योंकी जब शाम या संध्या के समय हमे कीसी की याद आ जाती है यही बात कवि ब्रजराज तिवारी ने कहा हे :
शाम होते ही
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शाम होते ही
कीसी की देह-सी
महक जाती चांदनी.
आईने मे
एक धुंधले चित्र-सी
उभर आती है
बारजे-छत पर अकेले जहां होता हुं
बिखर जाती है
उंगलियों से जब कभी
महसूस करना चाहता हूं
न जाने कयों
बहक जाती चांदनी.
नदी बन
पगदंडियों पर दौडती है
हवा बन कर कंपाती जल
एक गहरी धुंध में
डूबे हुए दिन की तरह
मुझे छलती रही हर पल
टहनियों मे
कीसी उलझे फूल-सी
मन में
कसक जाती चांदनी
शाम होते ही
कीसी देह सी
महक जाती चांदनी
=कवि ब्रजराज तिवारी
