panghat-पनघट

August 27, 2005

lord krishna birth day-जन्माष्टमी

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आज जन्माष्टमी है और हमारे नटखट कनैया का जन्मदीन हे,ये कनैया ही एक एसा देव है जिसके साथ खुलकर बाते कर सकते हे यानी मित्र या सखा जो भी कहो. आज ईसी पर्व पर फिल्म अमर प्रेम का गीत जो आनंद बक्षी ने बनाया था मे यहा लिख रहा हुं :

बड़ा नटखट है रे कृष्ण-कन्हैया
का करे यशोदा मैय्या, हाँ … बड़ा नटखट है रे

(ढूँढे री अंखियाँ उसे चारों ओर
जाने कहाँ छुप गया नंदकिशोर ) - २
उड़ गया ऐसे जैसे पुरवय्या
का करे यशोदा मैय्या, हाँ … बड़ा नटखट है रे

(आ तोहे मै गले से लगा लूँ
लागे ना किसी की नज़र मन मे छुपा लूँ ) - २
धूप जगत है रे ममता है छैंया
का करे यशोदा मैय्या, हाँ … बड़ा नटखट है रे

(मेरे जीवन का तू एक ही सपना
जो कोई देखे तोहे समझे वो अपना ) - २
सब का है प्यारा, हो सब का है प्यारा बंसी-बजय्या
का करे यशोदा मैय्या, हाँ … बड़ा नटखट है रे
=कवि आंनद बक्षी

August 7, 2005

evening time’s-शाम होते ही

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संध्या हंमेशा गमगीन होती है ये किसी लेखक ने कहा था ओर ये बात सत्य है क्योंकी जब शाम या संध्या के समय हमे कीसी की याद आ जाती है यही बात कवि ब्रजराज तिवारी ने कहा हे :
शाम होते ही
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शाम होते ही
कीसी की देह-सी
महक जाती चांदनी.

आईने मे
एक धुंधले चित्र-सी
उभर आती है
बारजे-छत पर अकेले जहां होता हुं
बिखर जाती है
उंगलियों से जब कभी
महसूस करना चाहता हूं
न जाने कयों
बहक जाती चांदनी.

नदी बन
पगदंडियों पर दौडती है
हवा बन कर कंपाती जल
एक गहरी धुंध में
डूबे हुए दिन की तरह
मुझे छलती रही हर पल
टहनियों मे
कीसी उलझे फूल-सी
मन में
कसक जाती चांदनी
शाम होते ही
कीसी देह सी
महक जाती चांदनी
=कवि ब्रजराज तिवारी

August 4, 2005

modern life-आधुनिक जीवन

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विज्ञान अच्छा है परंतु हमे आधुनिक विज्ञान की सभ्यता ने एक से बढकर एक एसा बौधिक चमत्कार दीखाके हमे एसा अंधा कर दिया है के हम अपनी आत्मजगत के रहस्यो को भूल गये है ओर हम मानविय चेतना को भी भूल गये,ईसी बात को लेकर कवि पंडीत ओम व्यास ने लीखा हे :
हमारे एक मित्र
एक दिन
विषय निकाल लिया विचित्र,
कहने लगे ओम भाई !
विज्ञान की भी क्या करामत है
सरेआम
अंदर की बहार बात है.
प्रजनन के पहेले ही फोटो
लडका हो तो आने दो,
लडकी हो तो रोको
मै ने कहा
तुम्हारे हिसाब से
लडका मेडल है
और लडकी है ट्रौफी !
वो कहने लगा
ईसी का जवाब तो है-
सौनोग्राफी.
फिर वह सोनोग्राफी के
पक्ष मे तर्क धरने लगा
कल और आज मे
फर्क करने लगा
कहने लगा,कविराज !
विज्ञानवालो ने भी
कया चमत्कार दिखाया है
कितने ही परिवारो को
दहेज समस्या से बचाया है
मैने कहा,मेरे दोस्त !
तेरे विचार भी बडे महान है
अरे,एक फायदे के पीछे
सौ सै नुकशान है.
गर ईस मशीन के प्रभाव
लडके ही लडके पृथ्वी पर आयेंगे
तो ईक्किसवी सदी के अंत तक
ईन लडको के लिये अलग
अलग बहुऐ कहा से लायेगे ?
तो बोला,
ईसका भी समाधान बताता हूं
संयुकत मोर्चा फोर्मूला समजाता हूं
अरे ! हम को-ओपरेटिव
आधार पर गृहस्थी चलायेगें
चार दूल्हो की बारात
लेकर जायेगें, बदल मै
एक दूल्हन लायेगे.
=कवि पंडीत ओम व्यास

August 3, 2005

elopement love-पलायनवादी प्यार

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प्यार :
एक उडता उडता समाचार
ओर अन्त मे
वो भी हो निराधार.

जिन्दगी :
पत्थर की लींक नही
भूल जाना
शायद ठीक नहीं

याद :
ताश में ज्यों कट जाये ईतवार

हर दृष्टि यों
सिलवटे चढाती हुई
ज्यों ‘एश-ट्रे’ धुआंती हुई

प्यास :
दुर्घटना-ग्रस्त हो जाय नई कार

डुबते मन से
मौन संघर्ष
कौन कर पाए
वर्ष-प्रति-वर्ष

दर्द :
खुदकुशी का घर
कुतुबमीनार
=कवि भूपेन्द्र कुमार स्नेही

August 2, 2005

Hello world!

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