panghat-पनघट

May 26, 2010

प्रगति की पृष्ठभूमि

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जो व्यक्ति दफतर के सर्द कमरे में बैठा हुआ है,
उसने जवानी मे कम-से-कम,
दस कुँवारियों से बलात्कार किया है ।
काँकटेल पार्टी में वह किसी सुन्दरी की,
नाभि पर नजर गडाये मन-ही-मन कामार्त हो उठता है,
वह व्यक्ति पाँच सितारा होटेल में अकसर,
अलग-अलग स्त्रियों की देह से जायका बदलता है ।
वह व्यक्ति घर लौटकर बीवी को पीटता है,
एक रुमाल या,
शर्ट के काँलर के लिए ।
वह व्यक्ति दफतर में बैठकर लोंगो से बातें करता है,
सिगरेट पीता है,
फाईलें छानता है,
घण्टी बजाकर कर्मचारी को बुलाकर डाँट पिलाता है,
बेयरे से चाय मँगाता है,पीता है ।
वह व्यक्ति लोगों को चरित्र का प्रमाण-पत्र बाँटता है ।
जो कर्मचारी दबी जुबान में बातें कर रहा है,
जो नहीं जानता कि, वह कभी नहीं समझेगा,
कितनी ऊँची आवाज में वह गरज सकता है घर में,
उसकी जुबान कितनी बेहूदी हो सकती है,
उसकी हरकतें कितनी अश्लील हो सकती है ।
वह यार-दोस्तों को जुटाकर सिनेमा का टिकट कटाता है,
नुक्क्ड पर बैठ राजनीति और कला-साहित्य पर,
गरमागरम बहस करता रहता है ।

किसी एक ने आत्महत्या की है,
उसकी माँ,
या दादि,
या फिर परदादी ने ।
घर लौटकर वह पत्नी को पीटता है,
एक साबुन के लिए या,
बच्चे को निमोनिया हो जाने पर,
जो बेयरा चय ला देता है,
जेब में लाईटर रखता है,
दो-चार रुपये बख्शीस पाता है,
उसने वाँजपन के कारण पहली बीवी को तलाक दे दिया है,
लडकी पैदा करने की वजह से दूसरी को,
और तीसरी बीवी को तलाक दिया है दहेज न लाने के कारण,
वह चौथी बीवी को घर लौटकर पीटता है,
दो कच्ची मिर्च या एक मुट्ठी भात के लिए ।
—तसलीमा नसरीन

September 24, 2008

half — हम सब आधे रास्तों की जिंदगी जी रहे हैं

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हम सब आधे रास्तों की जिंदगी जी रहे हैं हम सम्पूर्ण आवेगों के साथ
न तो घृणा कर पाते हैं न प्यार
न तो क्रोध कर पाते है, न क्षमा अधूरी कामनाऎं, अधूरी ईच्छाऎं,
अधूरे सपने, अधूरी बातें सब कुछ अपने में छिपाऎ अधूरे रास्तों पर घूमते हैं
हम जीवन को सम्पूर्ण जीने से डरते है, कतराते है अधूरी द्रष्टि, अधूरे विचार, अधूरे सम्बन्धों को
अपनाते हैं और उन्हें जो पूर्णता की खोज में
लावारिस घूमते मिल जाते हैं
आधे रास्ते से लौटा देते है. –कवि सर्वेश्वर दयाल.

December 19, 2007

politician talking crocodile - नेताजी की मगरमच्छ से बातचीत.

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नेताजी की मगरमच्छ से बातचीत.

“यार मगर,
थोडे आँसू
उधार दे दो अगर–
तो हम
देश की दुर्दशा पर
बहा आएँ ”

सुखी आँखो से
मगर ने कहा—
“आपने बडी देर कर दी हुजूर,
सारा स्टोक तो
दूसरी पार्टी वाले
ले गए है । ”
–कवि दिनकर सोनवलकर (हिन्दी के प्रसिध्ध व्यंग्य कवि )

March 15, 2007

forever शाश्वती

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* हम ‘महान साहित्य’ और ‘महान लेखक’ की चर्चा तो बहुत करते है । पर क्या ‘महान पाठक’ भी होता है ? या क्यों नही होता, या होना चाहिए ?

क्या जो समाज लेखक से ‘महान साहित्य’ की माँग करता है, उस से लेखक भी पलट कर यह नहीं पूछ सकता कि ‘क्या तुम महान समाज हो ?’

अगर ‘देश को वैसी ही सरकार मिलती है जिस के वह योग्य है,’ तो क्या ‘समाज को भी वैसा ही साहित्य मिलता है जिस के वह योग्य है’ ?

* आप को पहले से मालूम है कि आप क्या खोजने चले है, और आप अपने को रीएलिस्ट कहते है !

* खोजने चलो आदमी

मिलती है जनता ।

छपती है खबरे

ईतिहास नहीं बनता ।

* पेड के नीचे रुक कर सुस्ता लिया, फिर कापी निकाली तो मैं एक लम्बी साँस सुन कर चौंका । पर आस-पास कोई नहीं था । मैं ने सोचा, भ्रम होगा, हवा होगी । फिर लिखने की और दतचित हुआ ।

लम्बी साँस फिर सुनाई दी ।

पेड ने लम्बी साँस ली थी ।

मै ने कहा, “क्यों, पेड ,क्या हुआ ?’

पेड ने कहा, ‘तुम कवि हो न ?’

मै ने कहा, ‘हूँ भी तो क्या ? वन-प्रकृति का भक्त हूं, पेडो से प्रेम है मुझे–’

पेड टोक कर बोला, ‘होगा,होगा । तुम पेड पर कविता लिखो, या पेड को बचाने के आन्दोलन के लिए ही कविता लिखो, छपेगी तो पेड की लुगदी पर ही । जब-जब कोई लिखता है मैं लम्बी साँस लेता हूँ : यह पेड काटने का एक और निमित बना…’

पेड ने फिर लम्बी साँस ली ।

पेड के साथ कविता का एक यह भी रिश्ता है । ईतना साफ नहीं दिखा था न ?

कम लिखो । जब तक अनिवार्य न हो मत लिखो । जितना बनाना-सँवारना है, मानस में ही कर के तब रुप को कागज पर उतारो—जितना घना, छोटा, गठीला बना कर सम्भव हो…..

और हमेंशा पहले पेड को प्रणाम कर के, क्यों कि वही तुम्हारी बलि है…..

—”अज्ञय” [ शाश्वती]

More information : Agyeya

December 29, 2006

how i can walk with you - कैसे चल दूँ

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आज आपके सामने कवि दिनेश सलसेना दिनेशायन की रचना “कैसे चल दूं ” प्रस्तुत कर रहा हुं.

कैसे चल दूं

देश अजाना, पंथ अजाना
नाम न जाना, धाम न जाना
तुम्हीं बताओ, कैसे चल दूं, बैठ तुम्हारी पालकी
भरी बहारों पवन न डोला
चाँद सितारों ने विष धोला
कभी न लट गूँथी बदली ने
लाज लुटाई गली-गली ने
माँग न सेन्दुर, आँख न अंजन
पग न महावर, हाथ न कंगन
कैसे बैरिन बिंदिया से, शोभा दमकाउँ भाल की
सेज कली की सदा कटीली
भरी जवानी पीली-पीली
स्वप्नीली तस्वीर मिटाकार
कभी सेज पर कभी चिता पर
हँसी न मधुऋतु, उडी न केसर
लसे न भँवरो के नीलम पर
कैसे कलियाँ बन महकूँ तेरी चंपक उरमाल की
उड उड छाने अम्बर-भूतल
गिरते रहे पंख तिल-तिल जल
शाख-शाख ने ताने मारे
रुठे तिनके-दान सारे
नीड न चहके सांझ सवेरे
घनी रात लुट गये बसेरे
कैसे काटूँ रैन, बिरानी सेज अजानी डाल की
जब जब मंगल वेला आई
बजी नौबतें शुभ शहनाई
सिसक पडी सिंगार पिटारी
सपने दर दर बने भिखारी
दमक न पाई चुनरी-चोली
बाट जोहती सूनी डोली
किससे जोडूँ गांठ उमर बन चली दुल्हनियाँ काल की
–कवि दिनेश सकसेना दिनेशायन

October 26, 2006

platonic love - बन न सकूं पाषाण

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आज कवि भवानी प्रसाद तिवारी की रचना “बन न सकूं पाषाण” आपके सामने प्रस्तुत कर रहाँ हुं.

बन न सकूं पाषाण

कैसे छोडूं यह जीर्ण जगत, रह गये अधूरे गान, सखी

पग-ध्वनि सुनती हूं, आएँगे मन के रथ पर महेमान, सखी

जन-स्तुति के स्वर्णिम मंदिर में

वे प्रतिमा प्रस्तर, देव बने

लाचार, मनुजता खो न सकी

है मुझमें उनमें भेद घने

वे मनुज बनें तो बनें भले, मै बन न सकूं पाषाण, सखी

पग-ध्वनि सुनती हूं आएँगे, मन के रथ पर मेहमान, सखी

मैने कब माना, बहुत कहा

जगने, प्रिय आते सपने में

मै जगती हूँ, मैं तो देखूंगी

जाग्रत को ही अपने में

आखें मूंदें यदि परस करें मेरे जी को, वे प्राण, सखी

पग ध्वनि सुनती हूं, आएँगे मन के रथ पर मेहमान, सखी.

-कवि भवानी प्रसाद तिवारी

May 21, 2006

someone’s eye - किसी की अधमुंदी पलके

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कवि चिरंजीत का काव्य ‘किसी की अधमुंदी पलके ‘ प्रस्तुत करता हुँ.

किसी की अधमुंदी पलके

किसी की अधमुंदी पलके, मुझे सोने नही देती
ह्दय की धडकनों में आहटे ये मदभरी कैसी
मुझे सोने नहीं देतीं, सजग होने नहीं देती
तिमिर में आज ये परछाईयां भी मुस्कराती है
बिजलियां कौंधकर तम में मुझे खोने नही देतीं
खुले किस रजनिगंधा के अरे ये केश सुरभीले
कि ड्गमग रात मन का बोझ भी ढोने नहीं देतीं
सितारे चल दिये, चल दी, दिये की लौ पहरुये-सी
घटाओं-सी घिरी अलके सुबह होने नहीं देती
ये जीवन सत्तत हारों की, अभावो की कहानी है
मगर मधुरात की स्मृतियाँ मुझे रोने नही देतीं.
-कवि चिरंजीत

March 20, 2006

cry - रुदन

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यह कौन सी व्यवस्था है ?

यह कौन सी व्यवस्था है
नाटक के सारे पात्र जहां
खलनायक है
खुशामदी विदुषक
जिनके हर कूकर्म पर
तालिया बजाते है
जहां तिकडमी लफंगे
सत्ताधारी है
हाकिम तोडते है नियम
कानून-कायदे सिर्फ मामुली
लोगो के
वास्ते है
शरिफ धक्के खाते है
जहां सच्चाई दंडनीय है
सही बात कहने का साहस
संगीन अपराध है
-गिरजाकुमार माथुर

March 12, 2006

agun night - फागुन की राते है

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फागुन की राते चल रही है और ईसी बारे मे कवि मोहन अम्बर अपने काव्य कहते है अनविवाहीत का क्या हाल होता है.

फागुन की रातें है

चन्दा की शादी है,चादी की रातें है
तुमसे-कुछ कहने को,अधरो पर बातें है
पागुन की राते है
झिलमिल से तारे तो आतिश-अनारों-से
उजली पोशाकों में, बादल कहारो-से
नभवाली डोली में, दुल्हे-से चाँद को
लेकर जो जाते है, धरती को भाते है
फागुन की रातें है
नदियाँ पातुरनी-सी पायल बजाती है
समधिन-सी गेहूँ की बाले लजाती है
दर्शक - समूहो-सें पेडों के कुनवे है
कोलाहल करने को हिलडुल कर गाते है
पागुन की रातें है
गंधी की लडकी-सी बेला चमेली है
खुशबू-सा यौवन ले फिरती अकेली है
बाराती-लडकों से गेंदे के फूलों पर
कनखी ही कनखी में कर जाती घातें है
पागुन की रातें है .
खेतों के लावें मशालो से जलते है
शिशिरा के झोंके तरुणियों से चलते है
पीपल के पातों को ताशे-सा बजता सुन
अनगिन अनब्याहे-से मन दुख-दुख जाते है
पागुन की रातें है.
—कवि मोहन अम्बर

March 5, 2006

what i give u- तुम भी

Filed under: काव्य

आज-कल फागुन का महिना भी चल रहा है चलो आज कवि नरेन्द्र शर्मा की कविता को याद कर ले.

तुम भी बोलो, क्या दूँ रानी

पगली ईन क्षीण बाहुओं में
कैसे यों कस कर रख लोगी

एक, एक एक क्षण को केवल थे मिले प्रणय के चपल श्वास
भोली हो, समझ लिया तुमने सब दिन को अब गुंथ गये पाश
स्वच्छंद सदा मै मारुत-सा

वश में तुम कैसे कर लोगी
लतिकाओं के नित तोड पाश उठते ईस उपवन के रसाल
ठुकरा चरणाश्रित लहरों को उड जाते मानस के मराल
फिर कहो, तुम्हारी मिलन रात
ही कैसे सब दिन की होगी
मै तो चिर-पथिक प्रवासी हू, था ईतना ही निवास मेरा
रोकर मत रोको राह, विवश यह पारद-पद जीवन मेरा
राका तो एक चरण रानी
पूनों थी, मावश भी होगी

जीवन भर कभी न भूलूँगा उपहार तुम्हारे वे मधुमय
वह प्रथम मिलन का प्रिय चुम्बन यह अश्रु-हार अब विदा समय
तुम भी बोलो, क्या दुँ रानी
सुधि लोगी, या सपने लोगी

-कवि नरेन्द्र शर्मा






















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